क्या विरोध के नाम पर अभद्रता को वैध बनाया जा रहा है? —

लोकतंत्र, Gen Z और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

भारत एक जीवंत लोकतंत्र है। यहाँ असहमति व्यक्त करने, सरकार से प्रश्न पूछने और नीतियों का विरोध करने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त है। यही अधिकार लोकतंत्र को सशक्त बनाता है। किंतु एक मूलभूत प्रश्न आज हमारे सामने खड़ा है—क्या विरोध के अधिकार का अर्थ यह भी है कि सार्वजनिक जीवन की सभी मर्यादाएँ समाप्त हो जाएँ?

हाल ही में नीट परीक्षा से जुड़े विवाद के बाद दिल्ली में एक महीने से अधिक समय तक छात्रों का आंदोलन चला। इस आंदोलन को कई लोगों ने “Gen Z” पीढ़ी के आक्रोश का प्रतीक बताया। यह स्वाभाविक है कि यदि किसी परीक्षा या व्यवस्था को लेकर छात्रों के मन में शंका या असंतोष हो, तो वे अपनी बात लोकतांत्रिक ढंग से रखें। किसी भी लोकतंत्र में यह स्वस्थ परंपरा मानी जाती है।

लेकिन यदि किसी आंदोलन के दौरान चुने हुए प्रधानमंत्री, संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों या किसी भी सार्वजनिक प्रतिनिधि के लिए अपमानजनक और अशोभनीय भाषा का प्रयोग हो, सुरक्षा बलों को गालियाँ दी जाएँ, हिंसक व्यवहार को सामान्य बनाने का प्रयास किया जाए, तो यह केवल विरोध नहीं रह जाता; यह लोकतांत्रिक संवाद की मर्यादा को चुनौती देने लगता है।

विरोध और अभद्रता में अंतर समझना होगा

लोकतंत्र विरोध का अधिकार देता है, लेकिन अभद्रता का अधिकार नहीं देता।

सरकार की आलोचना कीजिए, नीतियों पर प्रश्न उठाइए, निर्णयों को चुनौती दीजिए, न्यायालय जाइए, सड़क पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कीजिए—ये सब लोकतांत्रिक अधिकार हैं। परंतु व्यक्तिगत गालियाँ, हिंसा का महिमामंडन या सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति घृणा फैलाना किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा नहीं हो सकता।

यदि आज किसी राजनीतिक दल, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या अन्य जनप्रतिनिधि के विरुद्ध अशोभनीय भाषा को “युवा अभिव्यक्ति” कहकर सामान्य बना दिया जाएगा, तो कल यही प्रवृत्ति विपक्ष, न्यायपालिका, पत्रकारों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं या किसी भी प्रतिष्ठित नागरिक के विरुद्ध भी दिखाई देगी। तब क्या हम उसी प्रकार मौन रहेंगे?

मौन भी एक संदेश देता है

लोकतांत्रिक समाज में केवल गलत कार्य ही नहीं, बल्कि गलत कार्य पर मौन भी महत्वपूर्ण संदेश देता है।

जब जिम्मेदार राजनीतिक दल, सार्वजनिक जीवन के वरिष्ठ लोग, शिक्षाविद, सामाजिक संगठन या प्रभावशाली हस्तियाँ ऐसी घटनाओं पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते, तो अनजाने में यह संदेश जा सकता है कि यदि अभद्रता हमारे राजनीतिक हितों के अनुकूल है, तो उसे अनदेखा किया जा सकता है।

यही स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है।

लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनाव जीतने या हारने से नहीं होती; उसकी रक्षा राजनीतिक संस्कृति से होती है। यदि राजनीतिक संस्कृति ही शालीनता खो दे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदलने लगता है।

सुरक्षा बलों का सम्मान राजनीति से ऊपर होना चाहिए

भारत के सुरक्षा बल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्य करते हैं। उनके कार्यों की समीक्षा हो सकती है, किसी कार्रवाई पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं, यदि कहीं अति हुई हो तो उसकी निष्पक्ष जाँच भी होनी चाहिए।

लेकिन समग्र रूप से सुरक्षा बलों के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग या उन्हें शत्रु के रूप में प्रस्तुत करना लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को कमजोर करता है। किसी भी लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति दीर्घकाल में समाज के लिए हितकारी नहीं मानी जाती।

Gen Z को दोष देना समाधान नहीं

इस पूरे विषय को केवल “Gen Z” बनाम अन्य पीढ़ियों के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा।

देश के अधिकांश युवा परिश्रमी हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, स्टार्टअप बना रहे हैं, सेना में भर्ती हो रहे हैं, शोध कर रहे हैं और राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहे हैं।

कुछ व्यक्तियों के व्यवहार के आधार पर पूरी पीढ़ी को कठघरे में खड़ा करना भी अनुचित होगा। आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं को यह समझाया जाए कि आक्रोश और अशिष्टता एक ही बात नहीं हैं। दृढ़ विरोध भी शालीन भाषा में किया जा सकता है।

राजनीतिक दलों की भी समान जिम्मेदारी

यह प्रश्न किसी एक दल या विचारधारा का नहीं है।

यदि आज सत्ता पक्ष के नेताओं के विरुद्ध अभद्र भाषा का विरोध किया जाता है, तो कल विपक्ष के नेताओं के विरुद्ध भी उसी दृढ़ता से आवाज उठनी चाहिए।

लोकतंत्र में मर्यादा व्यक्ति देखकर नहीं, सिद्धांत देखकर तय होनी चाहिए। यदि हम अपने विरोधी के लिए अभद्रता स्वीकार करते हैं, तो भविष्य में वही संस्कृति हमारे अपने पक्ष के विरुद्ध भी लौटकर आएगी।

लोकतंत्र की शक्ति संवाद है, दुर्व्यवहार नहीं

भारत की लोकतांत्रिक परंपरा बहस, तर्क, संवाद और संवैधानिक मर्यादाओं पर आधारित रही है। असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन असभ्यता उसकी आत्मा नहीं हो सकती।

यदि विरोध के नाम पर गाली-गलौज, हिंसा और संस्थाओं के प्रति अवमानना को सामान्य बना दिया गया, तो यह किसी एक सरकार या एक दल का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक वातावरण का नुकसान होगा।

आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, शिक्षण संस्थान और समाज के प्रभावशाली लोग एक समान मानदंड अपनाएँ—असहमति स्वीकार्य है, अभद्रता नहीं; आलोचना लोकतांत्रिक है, लेकिन हिंसा और अपमान कभी लोकतांत्रिक नहीं हो सकते।

लोकतंत्र तभी मजबूत रहेगा जब विरोध की आवाज़ भी उतनी ही संस्कारित होगी जितनी सत्ता की जिम्मेदारी।

Published by Nitin Sirohi

I’m passionate about understanding how politics, governance, and public policy impact everyday life. This blog is my space to share research, observations, and thoughtful analysis on current affairs, leadership, and nation-building. I believe informed citizens are the foundation of a strong democracy.

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